भुवन चंद्र खंडूड़ी को राजनीति में अनुशासन, ईमानदारी और समय की पाबंदी का प्रतीक माना जाता था। उनके निधन पर विभिन्न दलों के नेताओं ने भावुक होकर उनसे जुड़े कई संस्मरण साझा किए और कहा कि उन्होंने राजनीति में भी सैन्य अनुशासन की मिसाल कायम की।
भारतीय सेना में मेजर जनरल पद से सेवानिवृत्त होने के बाद जब उन्होंने राजनीति में कदम रखा, तब भी उनका जीवन पूरी तरह अनुशासित रहा। कहा जाता था कि यदि खंडूड़ी जी ने किसी समय पर मिलने का वादा किया है, तो लोग अपनी घड़ी का समय उनसे मिला सकते थे। वे हर कार्यक्रम और बैठक में तय समय पर पहुंचते थे और समय पालन को नेतृत्व का अहम हिस्सा मानते थे।
पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने बताया कि कैबिनेट बैठकों में यदि अधिकारी बिना तैयारी के नोट्स लेकर आते थे तो खंडूड़ी उन्हें फटकार लगाते थे। उनका मानना था कि पहले मंत्रियों को दस्तावेज दिए जाएं ताकि वे उनका अध्ययन कर सकें। उन्होंने कहा कि खंडूड़ी जी अंत तक अनुशासन और समय के प्रति समर्पित रहे।
बीकेटीसी अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी ने एक घटना याद करते हुए बताया कि हल्द्वानी में चुनावी बैठक के दौरान जब कई कार्यकर्ता समय पर नहीं पहुंचे, तब भी खंडूड़ी जी ने कार्यक्रम तय समय पर शुरू कराया। जितने लोग मौजूद थे, उन्हीं को संबोधित कर उन्होंने समय पर कार्यक्रम समाप्त कर दिया।
उनकी सादगी और ईमानदारी के कई उदाहरण आज भी लोगों को याद हैं। बताया जाता है कि 1991 में बैजरो में जनसभा के लिए जाते समय उनकी गाड़ी खराब हो गई थी, लेकिन उन्होंने रोडवेज बस से सफर कर समय पर सभा स्थल पहुंचकर लोगों को संबोधित किया।
तत्कालीन कोऑपरेटिव सोसायटी अध्यक्ष उमेश त्रिपाठी ने बताया कि खंडूड़ी जी फिजूलखर्ची के खिलाफ थे और अक्सर ट्रेन से सफर करते थे। उनकी जनसभाएं हमेशा समय पर शुरू होती थीं, चाहे भीड़ कम हो या ज्यादा।
राजनीति में उनकी साफ-सुथरी छवि, सख्त प्रशासनिक फैसले और विपक्ष को भी साथ लेकर चलने की शैली ने उन्हें अलग पहचान दिलाई। विपक्षी नेता भी उनकी ईमानदारी और निष्पक्षता के मुरीद थे।
